ब्राह्मीमैन्द्रीं विडङ्गानि व्योषं हिङ्गुजटां मुरम्|
रास्नां विषघ्नां लशुनं विशल्यां सुरसं वचाम्|
ज्योतिष्मतीं नागविन्नामनन्तां सहरीतकीम्|
काम्लीं च हस्तिमूत्रेण पिष्ट्वा छायाविशोषिता|
वर्तिर्नस्याञ्जनालेपधूपैरुन्मादसूदनी||२६||
स०-ब्राह्म्यादिभिर्गजमूत्रपिष्टा वर्तिश्छायायां विशोषिता नस्यादिभिरुन्मादहृत्| विषघ्ना-अतिविषा| विशल्या-लाङ्गली| नागविन्ना-नागदन्ती| काङ्क्षी-सौराष्ट्रिका|
ब्राह्मी, इन्द्रायणमूल, बायबिडंग, सोंठ, मिर्च, पीपल, हींग, जटामांसी, मुरामांसी,रास्ना, कलिहारी, लसुन, देवदाली (बिंडाल),तुलसी, बच, मालकंगनी, नागदन्ती, धमासा, हर और फटकीका समान भाग मिश्रित अत्यन्त महीन चूर्ण लेकर उसे बकरे के मूत्र में अन्छी तरह घोटकर बत्तियां बनाकर - उन्हें छाया में सुखा लें।
इनकी नस्य लेने, धूप देने और इनका - अञ्जन तथा लेप करनेसे उन्माद रोग नष्ट होता है।