Brief Description
भै.र.२७/८२-८८
कर्षद्वयं पारदस्य लौहं गन्धं च तत्समम् । लौहगन्धसमं चाभ्रं गुग्गुलुं कुडयद्वयम् ॥ ७७ ॥
अमृतायाः रसप्रस्थे रसपस्थे फलत्रिके । सान्द्रीभूते रसे तस्मिन्गर्भं दत्त्वा विचक्षणः ॥ ७ ॥
त्रिकटु त्रिफला दन्ती गुडूची चेन्द्रवारुणी । विडङ्गं नागपुष्पञ्च त्रिवृता ता च सुचूर्णितम् । ७६ ॥
प्रत्येकं कर्षमादाय सर्व मेकत्र कारयेत् । भक्षयेत् कोलमात्रं तु छिन्नाकाथानुपानतः ॥ ८० ॥
वातरक्तं महाघोरं स्फुटितं गलितं जयेत् । अष्टादशविधं कुठं कृमिरोगाश्मरीं तथा ॥८१ ॥
भगन्दरं गुदभ्रंशं श्वेतकुष्ठं सकामलम् । अपची गण्डमालां च पामां कण्डू विचर्चिकाम् ॥८२ ॥
चर्मकीलं महादद्रुं नाशयेन्नात्र संशयः । वातरक्तविनाशाय धन्वन्तरिकृतः पुरा ॥
रसाभ्रगुग्गुलुः ख्यातो वातरक्तेऽमृतोपमः ।। ८४ ॥
| Sl.No | Raw Material | Variant | Ratio | Quantity Required for 1000g | Unit |
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| Rasa | |
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| Guna | |
| Veerya | Ushna veerya |
| Vipaka | Madhura |
| Prabhava | |
| Anupanam | modal-content |
| Sl.No. | Disease Factor | Name of the combination | Form of the combination | Reference | Combination products | Procedure |
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| Disease Factors |
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| Type | Operator | Value | Unit | Frequency | Duration | Comment |
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