Brief Description
भा.प्र.म.२९/१६५-१६९
पुनर्नवामूलशतं विशुद्धं रुबूकमूलञ्च तथा प्रयोज्य । दत्वा पलं षोडशकञ्च शुण्ठ्याः संकुट्य सर्वान् विपचेत् .घटेपाम् ॥
पलानिचाष्टावथ कौशिकस्य तेनाष्टशेषेण पुनः पचेत्तु । एरण्डतैलं कुडवञ्च दद्यात् दत्वा त्रिवृच्चूर्णपलानि पञ्च ॥
निकुम्भचूर्णस्य पलं गुडूच्याः पलद्वयं चार्धपलं पलं वा ।पलत्रयत्र्यूषणचित्रकाणि सिन्धूत्थभल्लातविडङ्गकानि ॥
कर्षं तथा माक्षिकधातुचूर्णं पुनर्नवायाः पलमेव चूर्णम् । चूर्णानि दत्वा ह्यवतीर्य शीते खादेन्नरः कर्षसमप्रमाणम् ॥
वातासृजं वृद्धिगदञ्च सप्त जयत्यवश्यं त्वथ गृधृसीं च । जङ्घोरुपृष्ठत्रिकवस्तिजं च तथाऽमवातं प्रबलं च हन्ति ॥
| Sl.No | Raw Material | Variant | Ratio | Quantity Required for 1000g | Unit |
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| Rasa | |
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| Guna | |
| Veerya | Ushna veerya |
| Vipaka | Madhura |
| Prabhava | |
| Anupanam | modal-content |
| Sl.No. | Disease Factor | Name of the combination | Form of the combination | Reference | Combination products | Procedure |
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| Disease Factors |
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| Type | Operator | Value | Unit | Frequency | Duration | Comment |
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